Traditional worship ceremonies for various occasions and deities. Book experienced pandits for authentic Vedic rituals.
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नए घर में प्रवेश से पहले की जाने वाली यह पूजा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और वास्तु दोष दूर होते हैं। गणेश और लक्ष्मी की पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है।


भगवान गणेश विघ्नहर्ता और सिद्धिदाता हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में गणेश पूजा अवश्य की जाती है। यह पूजा सभी बाधाओं को दूर कर सफलता प्रदान करती है।


महाशिवरात्रि की रात्रि एवं किसी भी शुभ कार्य हेतु भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। यह अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी पूजा है।


माँ लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी हैं। शुक्रवार एवं दीपावली पर लक्ष्मी जी की पूजा विशेष फलदायी होती है। जोकि कारोबार वृद्धि ऑफिस या घर में उन्नति करती है


माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं। यह पूजा सभी बुराईयों का नाश करती है और सुरक्षा प्रदान करती है।


धनतेरस पर माँ लक्ष्मी और धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इस दिन नए बर्तन या आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है।


भगवान शिव आदिदेव हैं। शिव पूजा से आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।


भगवान कृष्ण प्रेम और आनंद के देवता हैं। कृष्ण पूजा से जीवन में प्रेम, आनंद और समृद्धि आती है।


काल सर्प दोष निवारण के लिए यह पूजा अत्यंत फलदायी है। भगवान शिव और नाग देवता की पूजा की जाती है।


नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। यह अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली पर्व है।


निर्माण कार्य शुरू करने से पहले भूमि देवी की पूजा की जाती है। यह पूजा भूमि को शुद्ध करती है और निर्माण में सफलता प्रदान करती है।


भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। यह पूजा अत्यंत फलदायी है।


माँ गौरी पार्वती का ही रूप हैं। यह पूजा विवाहित महिलाओं के लिए विशेष फलदायी है और सुहाग की रक्षा करती है।


भगवान सत्यनारायण की पूजा अत्यंत शुभ और फलदायी है। यह पूजा परिवार में सुख, समृद्धि और शांति लाती है। किसी भी मांगलिक कार्य या मनोकामना पूर्ति के लिए यह पूजा की जाती है।


नए व्यापार या कार्यालय के उद्घाटन पर यह पूजा की जाती है। गणेश और लक्ष्मी की कृपा से व्यापार में वृद्धि होती है।


संस्कार का अर्थ और उद्देश्य शब्द का अर्थ - 'नामकरण' संस्कृत के 'नाम' (नाम) और 'करण' (बनाना/रचना करना) से बना है, जिसका अर्थ है नाम देना या नाम की रचना करना। महत्व - यह शिशु को एक सार्थक और प्रभावशाली नाम देने की प्रक्रिया है, जिससे उसका जीवन सफल, यशस्वी और आनंदमय हो सके, और उसके व्यक्तित्व का विकास हो सके। वैज्ञानिक/दार्शनिक दृष्टिकोण - नाम का प्रभाव व्यक्ति के सूक्ष्म और स्थूल व्यक्तित्व पर पड़ता है। जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के आधार पर एक विशेष ध्वनि (नाम) का चयन किया जाता है, जो नवजात के लिए सर्वश्रेष्ठ हो । संक्षेप में, नामकरण संस्कार केवल नाम रखने की रस्म नहीं, बल्कि बच्चे के जीवन की एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक शुरुआत है, जो उसके भविष्य के लिए एक सकारात्मक नींव रखती है।


अन्नप्राशन संस्कार का अर्थ और महत्व पहला ठोस आहार: यह बच्चे के जीवन का वह महत्वपूर्ण पल होता है जब वह पहली बार माँ के दूध के अलावा अन्य भोजन ग्रहण करता है। स्वास्थ्य और दीर्घायु - यह शिशु के अच्छे स्वास्थ्य, बुद्ध ि और लंबी उम्र के लिए किया जाने वाला एक अनुष्ठान है, जिसके द्वारा यह कामना की जाती है कि वह शुद्ध अन्न खाकर शुद्ध मन का हो । आहारशुद्धि - "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" के सिद्धांत के अनुसार, शुद्ध आहार से शरीर और मन मे सात्विक गुण बढ़ते हैं, और यह संस्कार इसी उद्देश्य से किया जाता है। धार्मिक परंपरा - यह 16 संस्कारों में से एक है और इसे शुभ मुहूर्त में, यज्ञ और देवताओं के पूजन के साथ संपन्न किया जाता है। समय सामान्यत - शिशु के 6 महीने पूरे होने पर, जब उसके दांत निकलने लगते हैं, तब यह संस्कार किया जाता है। प्रसाद: मुख्य रूप से चावल की खीर (दूध, चीनी / शहद, घी मिलाकर) या दलिया खिलाया जाता है। पवित्र सामग्री - शहद, घी, तुलसी दल और गंगाजल का प्रयोग भी होता है। प्रतीकात्मक वस्तुएँ - चांदी की कटोरी और चम्मच से भोजन कराया जाता है, जो स्वच्छता और समृद्धि का प्रतीक है और हाथो से भोजन कराने के बजाय संक्रमण से बचाता है।


जन्मदिन पर इष्ट देव की पूजा करने से दीर्घायु और स्वास्थ्य प्राप्त होता है।


*चूड़ाकर्म संस्कार (या मुंडन संस्कार)* सनातन हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से आठवां है, जिसमें शिशु के जन्म के बाद पहली बार सिर के बाल उतारे जाते हैं, जो स्वास्थ्य, शुद्धिकरण, बुद्धि वृद्धि, दीर्घायु और पिछले जन्म के अवांछित संस्कारों से मुक्ति का प्रतीक है, ताकि शिशु को निरोगी, तेजस्वी और यशस्वी बनाया जा सके, जिसमें अक्सर शिखा (छोटी चोटी) छोड़ी जाती है और वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है। *महत्व और उद्देश्य:* स्वास्थ्य: गर्भ के बालों को अशुद्ध माना जाता है; उन्हें हटाने से सिर की खुजली, फोड़े और जूँ जैसी समस्याओं से बचाव होता है और सिर हल्का व ठंडा रहता है। शुद्धि और नवीनीकरण: यह शिशु को शारीरिक और मानसिक शुद्धता प्रदान करता है, जिससे वह नई ऊर्जा के साथ जीवन की शुरुआत करता है। *बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास* : यह मस्तिष्क को पुष्ट करता है, बुद्धि, बल और तेज की वृद्धि करता है, और बच्चे को अच्छे संस्कारों की ओर प्रेरित करता है। दीर्घायु और समृद्धि: वेदों के अनुसार, यह संस्कार बालक की लंबी आयु, ऐश्वर्य और उत्तम संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। *प्रक्रिया और परंपरा:* समय: यह संस्कार शिशु के पहले, तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष में, किसी शुभ मुहूर्त में किया जाता है, अक्सर अन्नप्राशन संस्कार के बाद। *मुंडन:* शिशु के सिर के बाल पहली बार उस्तरे (क्षुर) से उतारे जाते हैं, जिससे गर्भजन्य अशुद्ध बाल हट जाते हैं। *शिखा:* सिर के बीच में थोड़े बाल छोड़े जाते हैं (शिखा), जिससे कॉस्मिक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और यह हिंदुत्व की पहचान भी है। *मंत्रोच्चार:* नाई द्वारा बाल उतारते समय वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है, और माता मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करती है। *लेपन*: बाल उतारने के बाद सिर पर दूध, दही, घी और जल मिलाकर लेप लगाया जाता है, और चंदन या रोली से 'ॐ' या स्वस्तिक बनाया जाता है। *विसर्जन:* उतारे गए बालों को गोबर में लपेटकर या आटे के गोले में रखकर भूमि में गाड़ दिया जाता है या नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है, ताकि वे खाद बनकर धरती को उपजाऊ बनाएं। संक्षेप में, चूड़ाकर्म संस्कार शिशु के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जो उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए किया जाने वाला एक पवित्र अनुष्ठान है। यह संस्कार आप हमारे वैदिक विद्वानों के द्वारा करा सकते हैं


मंगल दोष के कारण विवाह में बाधा आती है। मंगल देव जी की पूजा से यह दोष दूर होता है।


पितृों की अशांति से जीवन में बाधाएं आती हैं। पितृ दोष शांति पूजा से पूर्वजों को शांति मिलती है।


मूल नक्षत्र में जन्मे जातकों के लिए यह पूजा अत्यंत आवश्यक है। यह दोष निवारण करती है। अब जीवन में उज्जवलता लाती है


माता की चौकी में माँ दुर्गा के भजन और आरती की जाती है। यह अत्यंत प्रसिद्ध भक्ति परंपरा है।


माँ सरस्वती विद्या और संगीत की देवी हैं। बसंत पंचमी पर यह पूजा विशेष फलदायी है।


लघु रुद्र पूजा में रुद्र पाठ के साथ विस्तृत शिव पूजा की जाती है। यह अत्यंत शक्तिशाली पूजा है।


अखंड रामायण पाठ 24 घंटे निरंतर चलता है। यह अत्यंत पवित्र और फलदायी पाठ है।


सुंदरकांड रामायण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह पाठ शक्ति और सफलता प्रदान करता है।


भगवान विष्णु के 1000 नामों का पाठ। यह अत्यंत पवित्र और शांतिदायक पाठ है।


पितृ पक्ष में पूर्वजों की याद में श्राद्ध किया जाता है। यह पूर्वजों को शांति प्रदान करता है।


विवाह संस्कार क्या है ...विवाह संस्कार सनातन हिन्दू धर्म में एक पवित्र और महत्वपूर्ण संस्कार है, जो दो व्यक्तियों (वर और वधू) को जीवन भर के लिए पति-पत्नी के रूप में जोड़ता है उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चार पुरुषार्थों) की प्राप्ति के लिए एक साथ बांधता है, और उन्हें निष्ठावान गृहस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जिसमें वे एक-दूसरे के प्रति समर्पण और सहयोग का भाव रखते हैं। यह सोलह संस्कारों में से एक है और जीवन के उत्तरार्ध (विद्याध्ययन के बाद) में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का द्वार खोलता है, जिससे पितृ ऋण से उऋण होने में मदद मिलती है। । *मुख्य उद्देश्य और महत्व:* आत्माओं का मिलन: यह दो आत्माओं को एक साथ लाता है, जिससे वे एक संयुक्त इकाई के रूप में जीवन बिता सकें। गृहस्थ जीवन की शुरुआत: यह विद्याध्ययन के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का माध्यम है, जो समाज और परिवार के लिए आवश्यक है। *ऋण मुक्ति:* यह पितृ ऋण (संतानोत्पत्ति द्वारा) और अन्य ऋणों से मुक्ति पाने का एक तरीका है। *समर्पण और सेवा:* यह पति-पत्नी के बीच समर्पण, सेवा और सहयोग के भाव को मजबूत करता है, जहाँ वे एक-दूसरे की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं। आदर्श जीवन: यह राम-सीता जैसे आदर्श दंपतियों की तरह निष्ठावान और प्रेमपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। *प्रमुख रस्में (संक्षिप्त):* द्वाराचार (Dwarachar): दूल्हे का स्वागत और पूजन। वागदान (Vagdan): वचनबद्धता। हस्तबंद/कन्यादान (Hastbandh/Kanyadaan): कन्या का दान। पाणिग्रहण (Panigrahan): वर-वधू का हाथ पकड़ना और पत्नी के रूप में स्वीकार करना। सप्तपदी/फेरे (Saptapadi/Fere): अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेना, जिसमें सात वचन लिए जाते हैं। ग्रन्थिबन्धन (Granthibandhan): गांठ बांधना, जिसमें गांठ में दूर्वा, पुष्प, हल्दी आदि रखकर आजीवन साथ रहने का संकल्प लिया जाता है। संक्षेप में, विवाह संस्कार केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक बंधन है जो जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है।


भगवान विश्वकर्मा को हिंदू धर्म में सृष्टि का शिल्पकार, पहला इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। उन्हें मशीनों, औजारों और निर्माण का देवता कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने सोने की लंका, द्वारका, इंद्रपुरी और हस्तिनापुर जैसे दिव्य नगरों का निर्माण किया था। निर्माण के देवता: उन्हें यंत्रों और शिल्प का अधिष्ठाता माना जाता है। पौराणिक निर्माण: उन्होंने स्वर्गलोक, सोने की लंका (रावण की), द्वारका (श्रीकृष्ण की) और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया था। अस्त्र-शस्त्र: विश्वकर्मा जी ने देवताओं के लिए वज्र और कई अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। पूजा का महत्व: विश्वकर्मा पूजा के दिन फैक्ट्रियों, कारखानों और कार्यशालाओं में मशीनरी और औजारों की पूजा की जाती है ताकि वे सुचारू रूप से चलें।


विवाह से पूर्व रिश्ते को मजबूती प्रदान करने हेतु विघ्न विनाशक भगवान गणेश गौरी ,नवग्रह एवं अन्य देवताओं से प्रार्थना


इस पूजा में पंचदेव पूजन जैसे गणेश गौरी, नवग्रह पूजन एवं अन्य मंगल वेद ध्वनि द्वारा वर को (टीका) ,माला, वस्त्र,मिष्ठान , नारियल, आभूषण आदि प्रदान किया जाता है


यज्ञोपवीत संस्कार की मुख्य विधि 1. पूर्व तैयारी और मुंडन: बालक का मुंडन किया जाता है और उसे स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। 2. गणेश पूजन व हवन: अग्नि स्थापना के बाद गणेश, वेदी और देवताओं का पूजन किया जाता है। 3. जनेऊ धारण: पवित्र यज्ञोपवीत को अभिमंत्रित कर बटुक (बालक) को धारण कराया जाता है। यह तीन धागों का होता है। 4. गायत्री मंत्र दीक्षा: गुरु या आचार्य बटुक के कान में गायत्री मंत्र का उपदेश देते हैं, जो बुद्धि को प्रखर करने के लिए होता है। 5. मेखला व दंड धारण: कमर में मूंज की मेखला (धागा) और पलाश का दंड धारण कराया जाता है, जो संयम और अनुशासन का प्रतीक है। 6. भिक्षाचरण: बटुक सबसे पहले माता और फिर अन्य जनों से भिक्षा मांगता है, जो अहंकार त्यागने की शिक्षा है। 7. संध्यावंदन का उपदेश: ब्रह्मचारी को नित्य गायत्री मंत्र के साथ संध्या वंदन करने की दीक्षा दी जाती है। महत्वपूर्ण नियम: • जनेऊ को सदैव बाएं कंधे के ऊपर और दाहिने हाथ के नीचे पहना जाता है। • मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को कान के ऊपर लपेटना अनिवार्य है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक है।


रिंग सेरेमनी (सगाई) पूजा विधि मे मुख्य रूप से गणेश-गौरी पूजन, कलश स्थापना, और अंगूठी की पूजा शामिल है, जो भावी वर-वधू के सुखी जीवन के लिए की जाती है। यह प्रक्रिया मंत्रोच्चार के बीच वर-वधू के वरण (टीका) और अंगूठी के आदान-प्रदान के साथ संपन्न होती है।


सेहरा बंदी दक्षिण एशिया की एक महत्वपूर्ण विवाह- पूर्व रस्म है, जिसमे दूल्हे की बहन या करीबी महिला परिवार के सदस्य उसके सिर पर सेहरा (फूलों या मोतियो से बना पर्दा/सिर का आभूषण) बांधती हैं। यह बारात (शादी) के निकलने से ठीक पहले होती है और बुराई से सुरक्षा, आशीर्वाद और एक नए, सम्मानजनक जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। ब्राह्मण द्वारा मंगल वेद मंत्रों द्वारा गणेश गौरी नवग्रह आदि पंचदेव पूजन किया जाता है


यह संस्कार सनातन हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में प्रथम संस्कार है, जो श्रेष्ठ और गुणवान संतान प्राप्ति के लिए विवाह के बाद दंपत्ति द्वारा किया जाने वाला एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसमें तन-मन की शुद्धि, वैदिक मंत्रों का जाप, और विशेष तिथियों व नियमों का पालन करते हुए गर्भधारण किया जाता है, ताकि गर्भस्थ शिशु पर सकारात्मक प्रभाव पडे और वह स्वस्थ व तेजस्वी बने। यह केवल शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक तैयारी के साथ किया जाने वाला एक विधि-विधान है।


पुंसवन संस्कार सनातन धर्म का दूसरा संस्कार है, जो गर्भावस्था के दौरान (आमतौर पर तीसरे महीने के आसपास) किया जाता है, जिसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु और माँ के उत्तम स्वास्थ्य, विकास और तेजस्वी संतान की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद व सकारात्मक ऊर्जा देना है, जिसमें विशेष औषधियों का प्रयोग, मंत्रोच्चार, हवन, और सकारात्मक विचारों व खान-पान पर जोर दिया जाता है, ताकि गर्भ में पल रहे शिशु का सर्वांगीण विकास हो सके।


उद्देश्य - गर्भपात रोकना, माता व शिशु की रक्षा करना, और शिशु के अच्छे गुण, स्वभाव और बुद्धि का विकास करना. कब करें - गर्भावस्था के चौथे, छठे या आठवें महीने में, आठवा महीना सबसे उत्तम माना जाता है. संस्कार की विधि और मंत्र (संक्षेप में) पूजा - भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिससे प्रसव के भय दूर हों. मांग भरना - पति गूलर (गूलर) की टहनी या कुशा से पत्नी की मांग तीन बार निकालता है मंत्रोच्चार - अदिति और प्रजापति से प्रेरित है,. नवग्रह मंत्र - पति-पत्नी मिलकर नवग्रह मंत्रों का जाप करते हैं जिससे शिशु को ग्रहों का अनुकूल प्रभाव मिले. ध्वनि का प्रभाव - वीणा जैसे मधुर संगीत का श्रवण कराया जाता है, जिससे शिशु पराक्रमी बने. ब्राह्मण द्वारा संस्कार कराएं हमसे जुड़ें


मुख्य उद्देश्य बाहरी दुनिया से परिचय - शिशु को पहली बार समाज और बाहरी वातावरण से जोड़ना। ईश्वरीय आशीर्वाद - सूर्य, चंद्रमा और अन्य देवताओं से शिशु के स्वस्थ, तेजस्वी और यशस्वी जीवन के लिए प्रार्थना करना। तेजस्वी और विनम्र बनाना - सूर्य के तेज और चंद्र की शीतलता से बच्चे को तेजस्वी और विनम्र बनाना विधि और परंपरा समय: जन्म के चौथे महीने में, जब शिशु का शरीर बाहरी वातावरण के अनुकूल हो जाता है। स्थान: घर के आँगन या मंदिर में किया जाता है, जहाँ सूर्य का प्रकाश आता हो । प्रक्रिया - सूर्य और चंद्र देव की पूजा की जाती है। शिशु को सूर्य की किरणें और चंद्रमा की रोशनी दिखाई जाती है। शंखनाद और वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है। माता-पिता और परिवार के सदस्य शिशु की सलामती के लिए प्रार्थना करते हैं। संक्षेप में, निष्क्रमण संस्कार शिशु के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो उसे घर के सुरक्षित दायरे से निकालकर प्रकृति और समाज से जोड़ता है, साथ ही उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थनाओ का प्रतीक है


ग्रह शांति पूजा की मुख्य बातें: उद्देश्यः ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव (जैसे- स्वास्थ्य समस्याएं, करियर में रुकावट, कलह) को शांत करना। प्रक्रियाः योग्य पंडित द्वारा नवग्रहों का आह्वान, मंत्र जाप, और हवन (अग्नि अनुष्ठान) के साथ विशेष सामग्री की आहुति दी जाती है। समय - यह आमतौर पर किसी विशेष ग्रह दोष के निवारण के लिए या नए घर में शिफ्ट होने से पहले शुभ मुहूर्त में की जाती है। लाभ: घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार, मानसिक शांति, और जीवन में स्थिरता आती है। पूजा में क्या शामिल है? गणेश पूजन - किसी भी विघ्न को दूर करने के लिए शुरुआत में। नवग्रह पूजनः सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु की स्थापना , पूजन , एवं हवन किया जाता है


हिंदू धर्म में नए वाहन (कार, बाइक, या ट्रक) की पूजा को वाहन पूजा कहा जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य यात्रा को सुरक्षित और शुभ बनाना


हल्दी रस्म भारतीय विवाहों में एक आनंदमय विवाह पूर्व समारोह है, जिसमें दूल्हा और दुल्हन के चेहरे, गर्दन, हाथो और पैरों पर हल्दी का पेस्ट (तेल/पानी/गुलाब जल के साथ मिलाकर) लगाया जाता है। घर पर आयोजित होने वाली यह रस्म शुद्धिकरण, शुभता और सौंदर्य का प्रतीक है, जबकि पीला रंग समृद्धि का प्रतीक है और बुरी आत्माओं को दूर भगाता है।


विवाह मंडप पूजा (मंडप स्थापना) हिंदू विवाह का एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है, जो वर-वधु के आने से पहले मुख्य विवाह स्थल को पवित्र करने के लिए किया जाता है। यह मंडप 4 खंभों (माता-पिता के प्रतीक) से बना होता है, जिसमे गणेश पूजा, कलश स्थापना, और अग्नि स्थापना की जाती है, जो विवाह को सिद्ध करने के लिए देवताओं को साक्षी मानते हैं।


बरसी पूजा (बरसी श्राद्ध) एक महत्वपूर्ण हिंदू अनुष्ठान है जो परिवार के दिवंगत सदस्य की पहली पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति का सम्मान करने, आत्मा की शांति सुनिश्चित करने और पूर्वजों को आदर देने के लिए किया जाता है। आमतौर पर, यह मृत्यु की तिथि (चंद्रमा के दिन) को ही आयोजित किया जाता है, जो अक्सर 11 महीने बाद मनाया जाता है, जिसमें वैदिक अनुष्ठान, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन शामिल होते हैं।