1पवित्रिकरण - आचार्य जी मंत्रोच्चार के साथ कुश (घास) या गंगाजल से यजमान (पूजा करने वाले) और पूजा सामग्री पर जल छिड़क कर शुद्ध करते हैं।
2दीप प्रज्वलन - पूजा के साक्षी स्वरूप दीपक जलाया जाता है। आसन शुद्धि - यजमान जिस आसन पर बैठते हैं, उसे मंत्रों द्वारा शुद्ध और स्थिर किया जाता है।
3स्वस्तिवाचन - वैदिक ब्राह्मणों द्वारा मंगलाचरण और कल्याणकारी मंत्रों का पाठ किया जाता है, जिससे चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।
4संकल्प - यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। यजमान के हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, कुशा और द्रव्य (सिक्का) देकर उनका नाम, गोत्र, स्थान और उनकी विशेष मनोकामना (जैसे- स्वास्थ्य लाभ, व्यापार में उन्नति, या पारिवारिक शांति) बोलकर संकल्प कराया जाता है।
5भगवान शिव के अभिषेक से पहले उनके पूरे परिवार और अन्य देवताओं का पूजन किया जाता है। प्रथम पूज्य गणेश और माता पार्वती (गौरी) - विघ्नहर्ता गणेश जी और माता गौरी का आह्वान कर उनका षोडशोपचार पूजन किया जाता है।
6कलश और वरुण देव पूजा - कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक मानकर उसमें देवताओं का आह्वान किया जाता है। नवग्रह शांति - नौ ग्रहों की अनुकूलता के लिए नवग्रह मंडल का पूजन होता है। शिव परिवार व नंदी पूजा - भगवान कार्तिकेय, सर्प देवता और शिव जी के परम भक्त नंदी महाराज की विशेष पूजा की जाती है।
7यदि पूजा किसी मंदिर या घर के पक्के शिवलिंग पर हो रही है, तो उत्तम है। अन्यथा, शास्त्रों के अनुसार पूजा सारथी के ब्राह्मण पवित्र मिट्टी, गंगाजल और गाय के घी को मिलाकर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करवाते हैं, जिसे अत्यंत फलदायी माना गया है।
8शिवलिंग को उत्तर दिशा की ओर मुख करके कांसे, तांबे या चांदी के बड़े पात्र (अभिषेक पात्र) में स्थापित किया जाता है। इसके बाद वैदिक मंत्रों द्वारा भगवान शिव का 'आवाहन' (बुलाना) और 'आसन' समर्पण किया जाता है। उन्हें ध्यान कर ध्यान मुद्रा में लाया जाता है।
9यह पूजा का सबसे मुख्य और दिव्य भाग है। इसमें पूजा सारथी के आचार्य 'शुक्ल यजुर्वेद' की रुद्राष्टाध्यायी के चमत्कारी मंत्रों का सस्वर (लयबद्ध) पाठ करते हैं और यजमान द्वारा शिवलिंग पर लगातार विभिन्न पवित्र द्रव्यों की धारा चढ़ाई जाती है।
10जल और गंगाजल - सबसे पहले शुद्ध जल और गंगाजल से स्नान कराया जाता है। पंचामृत स्नान - इसके बाद क्रमशः दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग स्नान और फिर एक साथ मिलाकर पंचामृत से अभिषेक होता है। विशेष द्रव्यों से अभिषेक (मनोकामना के अनुसार) गन्ने का रस लक्ष्मी प्राप्ति और धन-धान्य के लिए। शहद - कर्ज मुक्ति और पापों के नाश के लिए। सरसों का तेल - शत्रु बाधा और शनि दोष (साढ़ेसाती/ढैय्या) की शांति के लिए। दूध (गाय का): संतान प्राप्ति और लंबी आयु के लिए। शुद्धोदक स्नान - अंत में पुनः शुद्ध गंगाजल से भगवान शिव को स्वच्छ किया जाता है।
11अभिषेक के बाद भगवान शिव का बहुत ही सुंदर श्रृंगार किया जाता है - शिव जी को चंदन, भस्म और कुमकुम का त्रिपुंड लगाया जाता है। उन्हें बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र, आक के फूल, और जनेऊ (यज्ञोपवीत) अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद ब्राह्मणों द्वारा भगवान शिव के 108 नामों (अष्टोत्तर शतनामावली) का पाठ करते हुए हर नाम के साथ बेलपत्र या अक्षत चढ़ाए जाते हैं।
12हवन - रुद्राभिषेक की पूर्णाहुति के रूप में एक छोटा सा यज्ञ (हवन) किया जाता है, जिसमें रुद्र मंत्रों के साथ हवन सामग्री, घी और बेलपत्र की आहुतियां दी जाती हैं। पूर्णाहूति - नारियल और विशेष आहुति के साथ यज्ञ को संपन्न किया जाता है। (ऑप्शनल)
13महाआरती - कपूर और शुद्ध घी के दीपक से 'जय शिव ओंकारा' या 'कर्पूरगौरं..' के साथ भगवान शिव की दिव्य आरती की जाती है।
14क्षमा प्रार्थना - पूजा के दौरान जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए यजमान से 'अपराधक्षमापन स्तोत्र' या क्षमा प्रार्थना कराई जाती है।
15ब्राह्मण दक्षिणा व आशीर्वाद - अंत में वैदिक ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन, वस्त्र और दक्षिणा देकर उनका तिलक किया जाता है। ब्राह्मण यजमान के सिर पर मंत्राक्षत (आशीर्वाद के चावल) छिड़क कर उन्हें सपरिवार सुखी और आयुष्मान होने का आशीर्वाद देते हैं।