1इस विधि में पूजा सारथी के मुख्य आचार्य (पंडित जी) स्वयं ब्रह्मा का स्थान लेंगे और सहायक ब्राह्मणों के साथ मिलकर वैदिक मंत्रोच्चार (सस्वर पाठ) करेंगे।
2मंगलाचरण, पवित्रीकरण एवं स्वस्तिवाचन
विधि - आचार्य जी सबसे पहले यजमान (पति-पत्नी) के हाथ में पवित्र कुशा धारण कराएंगे। इसके बाद 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा...' मंत्र के साथ गंगाजल से शुद्धिकरण होगा।
3वैदिक क्रिया - ब्राह्मणों द्वारा कल्याणकारी स्वस्तिवाचन और शांतिपाठ के सस्वर मंत्रों का उच्चारण किया जाएगा, जिससे पूजा स्थल का वातावरण पूरी तरह सकारात्मक और शुद्ध हो जाए।
4गणपति-गौरी एवं मातृका पूजन
विधि: किसी भी वैदिक कार्य की शुरुआत में विघ्नहर्ता गणेश जी और माता गौरी की स्थापना की जाती है। इसके साथ ही षोडश मातृका (16 देवियों) और सप्तघृतमातृका की पूजा होगी।
महत्व - यह पूजा आने वाले शिशु और माँ को दीर्घायु, आरोग्य और सौभाग्य प्रदान करने के लिए की जाती है।
5कलश स्थापना एवं नवग्रह-दशदिक्पाल पूजन
विधि - वेदी पर सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) रखकर तांबे के वैदिक कलश की स्थापना की जाती है। कलश में पंचरत्न, सर्वौषधि, और गंगाजल डाला जाता है।
महत्व - नवग्रहों (सूर्य, चंद्र आदि) और दसों दिशाओं के देवताओं (दशदिक्पाल) का आह्वान किया जाता है ताकि गर्भस्थ शिशु पर किसी भी प्रकार का ग्रह-दोष या नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
6प्रधान देवता (धाता-राका) आवाहन एवं विशेष पूजन
विधि - सीमन्तोन्नयन संस्कार के मुख्य देवता 'धाता' (ब्रह्मा जी के रूप) और देवियां 'राका', 'सिनीवाली', 'कुहू' हैं। आचार्य जी वेदी पर इनका विशेष रूप से आह्वान और षोडशोपचार (16 सामग्रियों से) पूजन कराएंगे।
महत्व - ये देवता गर्भ को स्थिरता, सुरक्षा और शिशु को कुशाग्र बुद्धि प्रदान करते हैं।
7वैदिक गर्भ-रक्षक यज्ञ (हवन)
विधि - पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर समिधा (आम की लकड़ी), कपूर और गाय के शुद्ध घी से यज्ञ शुरू होगा। वैदिक ब्राह्मण ऋग्वेद और यजुर्वेद के विशेष सुक्तों का पाठ करते हुए आहुतियां दिलवाएंगे।
प्रमुख आहुति - गर्भ की रक्षा और प्रसव को सुगम बनाने के लिए विशेष मंत्रों से आहुति दी जाएगी।
8सीमंत कर्म (त्रिवृत संवारना - मुख्य वैदिक रस्म)
विधि: यज्ञ के दौरान पति अपनी गर्भवती पत्नी के पीछे खड़ा होगा। आचार्य जी के मंत्रोच्चार के बीच, पति अपनी पत्नी की मांग (सीमंत) को नीचे से ऊपर की ओर संवारते हुए तीन चीजों का स्पर्श कराएगा।
वीरतर (साही का कांटा): तीक्ष्ण बुद्धि और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता के लिए।
उदुम्बर (गूलर/कीकर का फल): वंश वृद्धि और समृद्धि के लिए।
शमी/चावल की हरी बालियां - शीतलता, धैर्य और
9वीणा वादन एवं साम गान (सकारात्मक ध्वनि तरंगें)
विधि - शास्त्रों के अनुसार इस समय गर्भस्थ शिशु के कान और सुनने की क्षमता विकसित हो चुकी होती है। इसलिए पूजा सारथी के ब्राह्मण इस चरण में मधुर स्वर में मंगल गान, वीणा (या शंख-घंटी) की ध्वनि और सामवेद के मंत्रों का पाठ करते हैं।
महत्व - इन दिव्य ध्वनियों से शिशु का मानसिक और आध्यात्मिक स्तर बहुत ऊंचा होता है।
10पूर्णाहुति, वसोर्धारा, आशीर्वाद एवं सुहाग रस्म
विधि - यज्ञ की अंतिम आहुति (पूर्णाहुति) के बाद घी की अटूट धारा (वसोर्धारा) गिराई जाती है। इसके बाद आचार्य जी यजमान दंपत्ति को मंत्राक्षत (वैदिक आशीर्वाद का चावल) और रक्षासूत्र बांधते हैं।
गोद भराई - अंत में परिवार की सुहागिन महिलाएं वैदिक रीति से फल-मेवों द्वारा महिला की गोद भरती हैं और ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर यह दिव्य संस्कार संपन्न होता है।
11"इस पूजा में उपयोग होने वाले सभी विशेष वैदिक यंत्र और दुर्लभ सामग्रियां (जैसे साही का कांटा, विशेष समिधा) पूजा सारथी के आचार्यों द्वारा स्वयं लाई जाएंगी। यजमान को केवल ताजी वस्तुएं (फल-फूल) ही रखनी होंगी।"