1स्थान शुद्धि - पूजा के स्थान और घर के मुख्य द्वार को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण (बंदनवार) लगाएं और सुंदर रंगोली बनाएं।
2आसन व्यवस्था - पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके यजमान (माता-पिता) के बैठने की व्यवस्था करें। हवन कुंड को पूजा चौकी के समीप स्थापित करें।
3शिशु का शृंगार - शिशु को उबटन और स्नान कराने के बाद नए, आरामदायक और मांगलिक रंग के वस्त्र (पीले, गुलाबी या सफेद) पहनाएं। शिशु के पिता या मामा उसे गोद में लेकर बैठते हैं।
4मंगलाचरण, पवित्रीकरण और संकल्प (Purification & Sankalpa)
पवित्रीकरण - पंडित जी द्वारा "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा..." मंत्र के साथ यजमान, शिशु और पूजा सामग्री पर कुशा से पवित्र जल का छिड़काव किया जाता है।
5स्वस्तिवाचन - वातावरण में सकारात्मकता और शांति के लिए पंडित जी मांगलिक मंत्रों (स्वस्तिवाचन) का पाठ करते हैं।
दीप पूजन - पूजा के साक्षी रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता है और उसका गंध, अक्षत, पुष्प से पूजन होता है।
6संकल्प - यजमान (पिता) अपने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, दूर्वा और द्रव्य (सिक्का) लेकर पंडित जी के पीछे संकल्प मंत्र दोहराते हैं:
शिशु के दीर्घायु, उत्तम आरोग्य, बुद्धि-विकास और तेजस्वी जीवन की कामना के साथ आज हम अपने बालक/बालिका का निष्क्रमण संस्कार कर रहे हैं। संकल्प का जल भूमि पर छोड़ दिया जाता है।
7देव आवाहन और मुख्य पूजन (Deity Worship)
गणेश-अम्बिका पूजन - किसी भी शुभ कार्य की तरह सबसे पहले भगवान गणेश और माता पार्वती का आवाहन और पूजन (षोडशोपचार या पंचोपचार विधि से) किया जाता है।
8कलश पूजन - वरुण देव के प्रतीक कलश की स्थापना कर उसमें देवी-देवताओं का आवाहन और पूजन किया जाता है।
9कुलदेवता एवं पितृ पूजन - घर के कुलदेवता, ग्राम देवता और पितरों का ध्यान कर उन्हें भोग लगाया जाता है और शिशु की रक्षा की प्रार्थना की जाती है।
10संक्षिप्त हवन / आयुष्य होमम् (Havan / Ayushya Homam)
हवन का उद्देश्य - शिशु के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, दीर्घायु और नवग्रहों की अनुकूलता के लिए अग्नि देव के माध्यम से देवताओं को आहुति दी जाती है।
अग्नि प्रज्वलन - हवन कुंड में आम की लकड़ियां और कर्पूर रखकर अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
11मुख्य आहुतियां -
गणेश जी और नवग्रह आहुति - सबसे पहले विघ्नहर्ता गणेश जी और नवग्रहों के नाम की आहुति दी जाती है।
आयुष्य सूक्त व महामृत्युंजय आहुति - शिशु की लंबी उम्र और आरोग्यता के लिए विशेष रूप से 'आयुष्य सूक्त' के मंत्रों या "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..." मंत्र से घी, सामग्री और काले तिल की आहुतियां दिलाई जाती हैं।
सूर्य/चंद्र देव आहुति - चूंकि यह निष्क्रमण संस्कार है, इसलिए सूर्य देव (दिन में) या चंद्र देव (रात्रि में) के नाम से विशेष आहुति दी जाती है।
12पूर्णाहुति - अंत में माता-पिता शिशु को गोद में लेकर खड़े होते हैं और नारियल के गोले (सूखा गोला) में घी भरकर 'मूर्धानं दिवो...' मंत्र के साथ पूर्णाहुति देते हैं।
13हवन भस्म धारण - हवन संपन्न होने के बाद, पंडित जी हवन कुंड की पवित्र भस्म (विभूति) से शिशु के माथे, कंठ और हृदय पर तिलक लगाते हैं ताकि उसकी सभी संकटों से रक्षा हो।
14गृह-निष्क्रमण और द्वार पूजा (Leaving the House)
शंखध्वनि - जैसे ही माता-पिता शिशु को गोद में लेकर कमरे से बाहर निकलते हैं, शंख बजाया जाता है और घंटे की ध्वनि की जाती है ताकि कोई भी नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाए।
15दहलीज (चौखट) पूजा - घर के मुख्य द्वार की दहलीज पर आकर पंडित जी द्वार-देवताओं की पूजा करवाते हैं। यहाँ माता जी चौखट पर स्वास्तिक बनाती हैं और घी का दीपक रखती हैं।
16पगड़ी या आंचल की छांव - शिशु को सीधे तेज धूप से बचाने के लिए पिता या मामा उसके सिर पर सुंदर वस्त्र, पगड़ी या आंचल की छांव करके उसे घर की सीमा से बाहर कदम रखवाते हैं।
17सूर्य देव और चंद्र देव दर्शन (Worship of Sun & Moon)
(नोट - यदि यह क्रिया दिन में हो रही है तो सूर्य दर्शन और यदि सायंकाल/रात्रि में हो रही है तो चंद्र दर्शन कराए जाते हैं।)
सूर्य दर्शन विधि - शिशु का मुख पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर किया जाता है। पंडित जी सूर्य गायत्री या वैदिक मंत्र का पाठ करते हैं:
मंत्र: "ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं..."
क्रिया - पिता शिशु को सूर्य देव की कोमल किरणों के दर्शन कराता है और उनसे बालक को तेज, ओज और आरोग्यता प्रदान करने की प्रार्थना करता है।
18चंद्र दर्शन विधि - यदि रात्रि का समय हो, तो चंद्रमा की धवल चांदनी में शिशु को लाया जाता है। माता-पिता अंजलि में जल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं और शिशु के मन की शांति व शीतलता के लिए प्रार्थना करते हैं।
19भूमि स्पर्श एवं दिशा पूजन (Earth & Directions Worship)
भूमि पूजन - घर के बाहर की साफ-सुथरी भूमि को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। वहाँ थोड़ा सा धान या सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) रखा जाता है।
स्पर्श क्रिया - माता-पिता शिशु के पैरों को बहुत कोमलता से उस अनाज और धरती मां पर स्पर्श कराते हैं।
भाव - हे धरती मां! इस बालक के कदम आपकी गोद में कल्याणकारी हों, यह सदैव धर्म के मार्ग पर चले और इसके जीवन में कभी स्थिरता की कमी न हो।
दिक्पाल पूजन - चारों दिशाओं के देवताओं (दिक्पालों) का ध्यान कर शिशु को चारों दिशाओं की ओर घुमाया जाता है ताकि उसे हर दिशा से सुरक्षा और यश मिले।
20देव-मंदिर गमन (Temple Visit)
घर के ठीक बाहर के अनुष्ठानों के बाद, शिशु को परिवार के साथ नजदीकी देव-मंदिर (जैसे भगवान शिव, विष्णु या हनुमान जी के मंदिर) ले जाया जाता है।
वहाँ भगवान के विग्रह के समक्ष शिशु को लिटाकर या झुकाकर प्रणाम कराया जाता है। पंडित जी द्वारा भगवान का चरणामृत और तुलसी दल शिशु के मस्तक पर लगाया जाता है।
21रक्षासूत्र, दीर्घायु आशीर्वाद और आरती (Conclusion & Blessings)
रक्षाबंधन - मंदिर से लौटने पर या पूजा स्थल पर पंडित जी शिशु के दाहिने हाथ (बालिका के बाएं हाथ) में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रक्षासूत्र (मौली) बांधते हैं।
आशीर्वाद (पुष्प वर्षा) - परिवार के सभी बुजुर्ग, दादा-दादी, नाना-नानी और पंडित जी शिशु के सिर पर अक्षत और दूर्वा रखकर "आयुष्मान भव, कीर्तिमान भव" का आशीर्वाद देते हैं।
नजर उतारना और आरती - माता या दादी द्वारा शिशु की कपूर से आरती उतारी जाती है और राई-नमक से नजर उतरी जाती है।
22दक्षिणा एवं प्रसाद - यजमान द्वारा आचार्य (पंडित जी) को ससम्मान वस्त्र, अनाज और दक्षिणा दी जाती है। इसके बाद उपस्थित सभी भक्तों और परिजनों में प्रसाद (पंचामृत या मिठाई) वितरित किया जाता है।