1वेदी निर्माण (Vedic Altar Setup) वेदी केवल एक भौतिक ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र स्थान है जहां देवताओं का आह्वान करके उन्हें आसन दिया जाता है।
2स्थान शुद्धिकरण (भूमि संस्कार): सबसे पहले चयनित स्थान को गाय के गोबर या गंगाजल से पवित्र किया जाता है। ब्राह्मणों द्वारा "अपसर्पन्तु ते भूता..." मंत्र का पाठ करके वहां से नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर किया जाता है।
3अष्टदल कमल व रेखा विन्यास: शुद्ध की गई भूमि या लकड़ी की चौकी पर शुद्ध पंचरंगी (पाँच रंगों के) चूर्ण या साफ चावलों से अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाया जाता है। बड़े अनुष्ठानों में सर्वतोभद्र मंडल, नवग्रह मंडल और लिंगतोभद्र मंडल की सुंदर और सटीक रचना की जाती है।
4कलश स्थापना (घट स्थापना): वेदी के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में अनाज की ढेरी (सप्तधान्य) पर तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता है। कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी, सर्वौषधि, और सप्तमृत्तिका (सात स्थानों की मिट्टी) डाली जाती है। इसके मुख पर आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते रखकर ऊपर से नारियल (कलावा लपेटकर) स्थापित किया जाता है।
5सर्वदेव पूजन क्रम (Worship of All Deities) वेदी तैयार होने के बाद, शास्त्रों के नियम अनुसार छोटे देवताओं से लेकर सर्वोच्च देवताओं तक का क्रमबद्ध पूजन (Hierarchy of Worship) शुरू होता है:
6गणपति और अंबिका (गौरी) पूजन प्रथम पूज्य सबसे पहले वेदी पर स्थापित भगवान गणेश और माता पार्वती (अंबिका) का आह्वान किया जाता है। उन्हें स्नान, वस्त्र, चंदन, अक्षत, दूर्वा (घास) और मोदक अर्पित कर पूजा को निर्विघ्न पूरा करने की प्रार्थना की जाती है।
7कलश देव (वरुण देव) पूजन ब्रह्मांडीय शक्तियां कलश को साक्षात ब्रह्मांड और सभी तीर्थों का रूप माना जाता है। कलश में स्थित वरुण देव, चारों वेदों और सभी पवित्र नदियों का आह्वान करके धूप-दीप से उनकी पूजा की जाती है। इसी कलश के जल से आगे पूरी पूजा में शुद्धिकरण किया जाता है।
8नवग्रह और पंचलोकपाल पूजन समय और भाग्य के नियंत्रक वेदी पर बनाए गए नवग्रह मंडल में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु का उनके विशिष्ट वैदिक मंत्रों द्वारा आह्वान किया जाता है। इसके साथ ही पंच लोकपाल (गणेश, दुर्गा, विष्णु, शिव, सूर्य) और दस दिक्पालों (दशों दिशाओं के रक्षक जैसे इंद्र, अग्नि, यम आदि) की पूजा की जाती है ताकि सभी ग्रह-नक्षत्र अनुकूल फल दें।
9प्रधान देवता पूजन (भगवान महामृत्युंजय शिव) सर्वोच्च सत्ता सभी देवों के पूजन और उनकी अनुमति के बाद, वेदी के केंद्र (मुख्य आसन) पर स्थापित भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप या महामृत्युंजय यंत्र का षोडशोपचार पूजन (16 चरणों वाली पूजा) शुरू होता है। इसमें उनका महा-अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत (जनेऊ), चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, भस्म और विशेष नैवेद्य (भोग) अर्पण शामिल है।
10अग्नि प्रज्वलित करना (अग्नि आधान) कपूर और घी की सहायता से मंत्रोच्चार के साथ हवन कुंड में अग्नि देव को जागृत किया जाता है। अग्नि देव का ध्यान "सप्तजिह्व" (सात जीभ वाले) रूप में करके उनका पूजन किया जाता है।
11मुख्य महामृत्युंजय मंत्र के अंत में "स्वाहा" जोड़कर आहुतियाँ शुरू की जाती हैं: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् स्वाहा॥
12व्याहृति और स्विष्टकृत आहुति मुख्य आहुतियों के बाद भूः, भुवः, स्वः (महाव्याहृति) मंत्रों से आहुति दी जाती है। इसके बाद, हवन में अनजाने में हुई किसी भी कमी को पूरा करने और अग्नि देव का आभार व्यक्त करने के लिए "स्विष्टकृत" आहुति दी जाती है।
13पूर्णाहुति (The Final Offering) यह हवन का सबसे मुख्य और भावुक क्षण होता है। एक सूखे नारियल (गोला) के ऊपर कलावा बांधकर, उसमें पंचमेवा, घी और बची हुई हवन सामग्री भरी जाती है। यजमान और उनका परिवार खड़े होकर आचार्यों के साथ "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं..." मंत्र का उच्चारण करते हुए उस नारियल को जलती हुई यज्ञ अग्नि में समर्पित करते हैं। इसका अर्थ है कि हम अपना अहंकार और संकट भगवान को सौंपकर पूर्णता को प्राप्त हो रहे हैं।
14हवन का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व स्वास्थ्य लाभ: हवन में उपयोग होने वाली सामग्रियां जैसे गिलोय, गुग्गल और कपूर जब अग्नि के संपर्क में आती हैं, तो उनसे निकलने वाला धुआं वायुमंडल से बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करता है। श्वसन के माध्यम से यह धुआं शरीर में जाकर फेफड़ों और रक्त को शुद्ध करता है (इसे यज्ञ थेरेपी भी कहा जाता है)।