1शुद्धि, पवित्रीकरण और स्वस्तिवाचन (Purification)
पवित्रिकरण - पूजा की शुरुआत में पंडित जी शिशु, माता-पिता (यजमान) और पूरे पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़क कर पवित्र करते हैं।
स्वस्तिवाचन - इसके बाद वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा के संचार और देवताओं की अनुकूलता के लिए वेद मंत्रों का सस्वर पाठ (स्वस्तिवाचन) किया जाता है।
2विशेष संकल्प (The Sacred Vow)
माता-पिता शिशु को गोद में लेकर बैठते हैं। मुख्य आचार्य उनके हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और द्रव्य (सिक्का) देकर शिशु का नाम, जन्म समय, जन्म स्थान और गोत्र का उच्चारण करवाते हैं।
संकल्प लिया जाता है कि शिशु के जन्म नक्षत्र के अशुभ प्रभावों को दूर करने और उसके दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए यह गंडमूल शांति अनुष्ठान किया जा रहा है।
3कलश स्थापना और 27 नक्षत्रों का आह्वान (Kalash & 27 Nakshatra Puja)
इस पूजा में एक विशेष मुख्य कलश और उसके साथ 27 छोटे मिट्टी के कलश (कुंभ) स्थापित किए जाते हैं।
इन 27 कलशों में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 27 अलग-अलग कुओं/नदियों का जल, 27 स्थानों की मिट्टी और 27 प्रकार के वृक्षों के पत्ते (जैसे बरगद, पीपल, गूलर आदि) डाले जाते हैं।
मंत्रोच्चारण के साथ आकाशमण्डल के सभी 27 नक्षत्रों के देवताओं का इन कलशों में आह्वान करके पूजन किया जाता है।
4नवग्रह और रक्षा विधान (Navgraha Puja)
शिशु की कुंडली के ग्रहों को शांत और अनुकूल बनाने के लिए नवग्रह मंडल बनाकर सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु का वैदिक पूजन किया जाता है।
साथ ही भगवान शिव, माता दुर्गा और हनुमान जी की आराधना की जाती है ताकि शिशु की हर संकट से रक्षा हो।
5जन्म नक्षत्र देव का विशेष पूजन (Main Deity Puja)
जिस विशिष्ट नक्षत्र में बच्चे का जन्म हुआ है (जैसे अश्विनी, रेवती, मूल आदि), उस नक्षत्र के अधिष्ठात्री देवता (जैसे केतु या बुध देव) की विशेष प्रतिमा या यंत्र स्थापित करके उनका षोडशोपचार (16 सामग्रियों से) पूजन किया जाता है।
6मूल शांति मंत्र जप (Mantra Chanting)
मुख्य आचार्य के मार्गदर्शन में अन्य ब्राह्मणों द्वारा उस विशेष दोषपूर्ण नक्षत्र के वैदिक और पौराणिक मंत्रों का निर्धारित संख्या (आमतौर पर 27,000 या यथाशक्ति) में जप शुरू होता है। यह जप शिशु के मानसिक और शारीरिक दोषों को समाप्त करता है।
7महाहवन और पूर्णाहुति (Havan / Yajna)
जप पूरा होने पर यज्ञ वेदी में पवित्र अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
नक्षत्र देव, नवग्रह और रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों के साथ विशेष औषधियों, जड़ी-बूटियों, शुद्ध गाय के घी और सामग्री से आहुतियां दी जाती हैं। अंत में सूखे नारियल (गोला) के साथ 'पूर्णाहुति' दी जाती है।
8छाया दान (Chhaya Daan - अत्यंत महत्वपूर्ण चरण)
यह इस पूजा का सबसे मुख्य और अनिवार्य हिस्सा है। एक कांसे या पीतल के कटोरे में शुद्ध पिघला हुआ देसी घी भरा जाता है।
पिता उस घी के कटोरे में अपने नवजात शिशु का चेहरा (परछाई) देखते हैं और फिर कुछ सिक्के डालकर उसे दान कर देते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से पिता पर आने वाला कष्ट दूर हो जाता है।
9छिद्रों वाले घड़े से महाअभिषेक (Sieve / 27-Hole Pot Bath)
एक विशेष मिट्टी का घड़ा लिया जाता है जिसमें 27 छिद्र (holes) होते हैं।
माता-पिता बच्चे को लेकर बैठते हैं और पंडित जी 27 कलशों के पवित्र जल, औषधियों और गंगाजल के मिश्रण को उस 27 छिद्रों वाले घड़े के माध्यम से छानते हुए शिशु और माता-पिता पर औषधीय स्नान (अभिषेक) करवाते हैं। इससे बच्चे का शारीरिक और मानसिक दोष पूरी तरह धुल जाता है।
10ब्राह्मण भोजन, दान और आशीर्वाद (Blessings)
पूजा संपन्न होने के बाद, आचार्यों को वस्त्र, अनाज और दक्षिणा दी जाती है।
पंडित जी शिशु को रक्षासूत्र (मौली) बांधते हैं, माथे पर तिलक लगाते हैं और उसे दीर्घायु, आरोग्यता और उज्ज्वल भविष्य का महाआशीर्वाद देते हैं।
11💡 माता-पिता के लिए विशेष नियम (Rules for App
चेहरा न देखना - जब तक जन्म के 27वें दिन यह पूजा संपन्न नहीं हो जाती, तब तक पिता को बच्चे का चेहरा देखने की मनाही होती है (कुछ विशेष नक्षत्र चरणों में)। पूजा के दिन 'सामूहिक छाया दान' के बाद ही पिता बच्चे को गोद में लेते हैं।
- पूजा के समय माता-पिता को साफ और हल्के रंग के सूती वस्त्र (जैसे पीला या सफेद) पहनने चाहिए।
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